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Dr. Anwer Jamal Khan


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जिस्मानी रिश्तों के लिए समाज की अनुमति ज़रूरी है

Posted On: 5 Sep, 2012  
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में

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एक दान-पर्व है ईद-उल-फितर Eid 2012

Posted On: 16 Aug, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा: rajivupadhyay rajivupadhyay

के द्वारा:

के द्वारा: jlsingh jlsingh

@ dineshaastik ji ! ईश्वर मुख्य कारक है और वही सब कुछ करता है और उसकी अनुमति के बिना एक पत्ता की नहीं खड़कता यह ऐसे वाक्य हैं जो विदित रूप से बिल्कुल सही लगते हैं किंतु इन वाक्यों और उनके अर्थों को समझने के लिए बहुत अधिक चिंतन व गहराई की आवश्यकता है। इस प्रकार की सोच व विचार धारा के कुप्रभाव उस समय प्रकट होते हैं जब हम मनुष्य के कामों के दायित्व के बारे में बात करें। अर्थात यदि हम यह बात पूर्ण रूप से मान लें कि संसार में हर काम ईश्वर से संबंधित है और वही हर काम करता है तो फिर मनुष्य और उसके कर्म के मध्य कोई संबंध नहीं रहता अर्थात मनुष्य जो कुछ करता है उसकी उस पर ज़िम्मेदारी नहीं होती। दूसरे शब्दों में इस ग़लत विचारधारा का एक परिणाम यह होगा कि फिर मनुष्य के किसी काम में उसकी इच्छा का कोई प्रभाव नहीं होगा जिस के परिणाम स्वरूप मनुष्य अपने कामों का ज़िम्मेदार भी नहीं होगा और इस प्रकार से मनुष्य की सब से महत्वपूर्ण विशेषता अर्थात चयन का अधिकार का इन्कार हो जाएगा और हर वस्तु और हर क़ानूनी व्यवस्था खोखली हो जायेगी तथा धर्म व धार्मिक शिक्षाओं का भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। क्योंकि यदि मनुष्य को अपने कामों में किसी प्रकार का अधिकार नहीं होगा और सारे काम ईश्वरीय आदेश व इच्छा से होंगे तो फिर दायित्व व धार्मिक प्रतिबद्धता तथा पाप व पुण्य का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा और इस से पूरी धार्मिक व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। अर्थात उदाहरण स्वरूप चोरी करना या किसी की हत्या करना धार्मिक रूप से महापाप है और इस पर कड़ा दंड है किंतु यदि हम यह मान लें कि ईश्वर के आदेश के बिना कोई पत्ता नहीं हिलता और मनुष्य के सारे काम ईश्वर के आदेश से होते हैं तो फिर चोर और हत्यारा यह कह सकता है कि यदि मैंने चोरी की या हत्या की तो इसकी ज़िम्दारी मुझ पर नहीं है ईश्वर पर है उसने मुझे से चोरी करवाई और हत्या करवाई तो फिर यदि ज़िम्मेदारी नहीं होगी तो उसे दंड भी नहीं दिया जा सकता इसी प्रकार पुण्य करने वाले को यदि प्रतिफल दिया जाएगा और स्वर्ग में भेजा जाएगा तो भी यह आपत्ति हो सकती है कि यदि उसने अच्छा काम किया तो फिर उसमें उसका क्या कमाल है क्योंकि ईश्वर ने चाहा कि वह अच्छा काम करे इस लिए उसने अच्छा काम किया तो इसका फल उसे क्यों मिले? इसी प्रकार हर कोई अपने भीतर थोड़ा सा ध्यान देने के बाद यह समझ जाता है कि वह बात कर सकता है या नहीं, अपना हाथ हिला सकता है या नहीं, खाना खा सकता है या नहीं। किसी काम को करने का फैसला कभी शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए होता है उदाहरण स्वरूप एक भूखा व्यक्ति खाने का फैसला करता है या प्यासा व्यक्ति पानी पीने का इरादा करता है किंतु कभी-कभी मनुष्य का इरादा और निर्णय बौद्धिक इच्छाओं व उच्च मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए होता है जैसाकि एक रोगी स्वास्थ्य लाभ के लिए कड़वी दवांए पीता है और स्वादिष्ट खानों से परहेज़ करता है या अध्ययन करने वाला और शिक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति और वास्तविकताओं की खोज के लिए, भौतिक सुखों की ओर से आंख बंद कर लेता है और अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कठिनाइयां सहन करता या साहसी सैनिक अपने देश की रक्षा जैसे उच्च लक्ष्य के लिए अपने प्राण भी न्यौछावर कर देता है। तो इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि उद्देश्य उच्च हो तो उसके मार्ग में कठिनाईयों का कोई महत्व नहीं होता। वास्तव में मनुष्य का महत्व उस समय प्रकट होता है जब उस की विभिन्न इच्छाओं के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाए और वह नैतिक गुणों और सही अर्थों में मानवता की चोटी पर पहुंचने के लिए अपनी शारीरिक इच्छाओं व आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है और यह तो स्पष्ट है कि हर काम, जितने मज़बूत इरादे और चेतनापूर्ण चयन के साथ किया जाता है वह आत्मा के विकास या पतन में उतना ही प्रभावी होता है तथा दंड या पुरस्कार का उसे उतना ही अधिक अधिकार होता है। अलबत्ता शारीरिक इच्छाओं के सामने प्रतिरोध की क्षमता सब लोगों में हर वस्तु के प्रति समान नहीं होती किंतु हर व्यक्ति थोड़ा बहुत ईश्वर की इस देन अर्थात स्वतंत्र इरादे का स्वामी होता ही है और जितना अभ्यास करता है उसकी यह क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है। इस आधार पर मनुष्य में इरादे की उपस्थिति के बारे में कोई शंका नहीं है और इस प्रकार की स्पष्ट और महसूस की जाने वाली भावना के बारे में कोई शंका होनी भी नहीं चाहिए और यही कारण है कि मनुष्य में इरादे और स्वतंत्रता के विषय पर सभी ईश्वरीय धर्मों में बल दिया गया है और इसे सभी ईश्वरीय धर्मों और नैतिक मतों में एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया गया है क्योंकि इस विशेषता के बिना कर्तव्य, दायित्व, आलोचना, दंड, अथवा पुरस्कार आदि की कोई गुंजाईश ही नहीं रहेगी।

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

आप के कथन से पता चला कि आपको इतिहास का पता नहीं है. इस प्रकार की शंका कम गहराई से सोचने वाले लोग प्रकट करते हैं किंतु यह भी देखा गया है कि कुछ वैज्ञानिक और पढ़े लिखे लोग भी यह प्रश्न कर बैठते हैं अलबत्ता यह लोग उन लोगों में से होते हैं जो इन्द्रियों से महसूस किये जाने के सिद्धान्त में विश्वास रखते हैं और हर उस अस्तित्व का इन्कार करते हैं जिसे वह इन्द्रियों द्वारा महसूस न कर सकें। इस प्रकार की शंका का निवारण इस प्रकार से किया जा सकता है कि इन्द्रियों द्वारा केवल आयाम व व्यास रखने वाली वस्तुओं और अस्तित्वों को ही महसूस किया जा सकता है। हमारी जो इन्द्रियां हैं वह विशेष परिस्थितियों में उन्हीं वस्तुओं को महसूस करती हैं जो उनकी क्षमता के अनुरुप हों। जिस प्रकार से यह नहीं सोचा जा सकता कि आंख, आवाज़ों को सुने या कान रंगों को देखें उसी प्रकार यह भी नहीं सोचा जा सकता कि ब्रह्माण्ड की सारी रचनाओं को हमारी इन्द्रियां महसूस कर सकती हैं। क्योंकि पहली बात तो यह है कि यही भौतिक वस्तुओं में भी बहुत सी एसी चीज़ें हैं जिन्हें हम इन्द्रियों द्वारा सीधे रूप से महसूस नहीं कर सकते जैसे हमारी इन्द्रियां पराकासनी किरणों को या चुंबकीय लहरों को महसूस नहीं कर सकतीं किंतु फिर भी हमें उनके अस्तित्व पर पूरा विश्वास है। या इसी प्रकार से भय व प्रेम की मनोदशा या हमारे इरादे और संकल्प यह सब कुछ मौजूद है किंतु हम इन्हें अपनी इंद्रियों से महसूस नहीं कर सकते क्योंकि मनोदशाओं और मानसिक अवस्था को इन्द्री द्वारा महसूस किया जाना संभव नहीं है। इसी प्रकार आत्मा को भी इन्द्रियों द्वारा महसूस नहीं किया जा सकता और यह यह महसूस करना या आभास करना स्वयं ही ऐसी दशा है जिसे इन्द्रियों द्वारा महसूस नहीं किया जा सकता। इस प्रकार से यह प्रमाणित हो गया कि विदित रूप से हमारी इन्द्रियों द्वारा यदि किसी वस्तु को आभास करना संभव न हो तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं होगा कि वह वस्तु मौजूद ही नहीं है या यह कि उसका होना कठिन है।

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

@ Pritish ji ! शुक्रिया भाई साहब . धर्म क्या है? धर्म वास्तव में कुछ लोगों के विश्वासों और ईश्वर की ओर से मानव समाज के लिए संकलित शिक्षाओं को कहा जाता है और इसे एक दृष्टि से कई प्रकारों में बांटा जा सकता है। उदाहरण स्वरूप प्राचीन व विकसित धर्म। यदि इतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो धर्म व मत लाखों करोड़ों प्रकार के हैं किंतु हम धर्म के प्रकारों पर चर्चा नहीं करना चाहते बल्कि हम स्वयं धर्म पर संक्षिप्त सी चर्चा करेंगे। धर्म या दीन का अर्थ आज्ञापालन, पारितोषिक आदि बताया गया है किंतु दीन अथवा धर्म की परिभाषा हैः संसार के रचयिता और उसके आदेशों पर विश्वास व आस्था रखना। अर्थात धर्म एक प्रक्रिया का नाम है जिसके अंतर्गत धर्म का मानने वाला इस सृष्टि के रचयिता के अस्तित्व को मानते हुए उसके आदेशों का पालन करता है। इस आधार पर जो लोग किसी रचयिता के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते और इस सृष्टि के अस्तित्व को संयोगवश घटने वाली किसी घटना का परिणाम मानते हैं। उनके विचार में कोई प्रलय और परलोक नहीं है बल्कि संसार एक दिन समाप्त हो जाएगा और उसी के साथ सारा अस्तित्व विलुप्त हो जाएगा। इस प्रकार के लोगों को नास्तिक कहा जाता है। जो लोग इस सृष्टि के रचयिता को मानते हैं उन्हें धर्मिक और आस्तिक कहा जाता है अब चाहे उनकी अन्य आस्थाओं में कुछ अनुचित बातें भी क्यों न शामिल हों। इस प्रकार संसार में पाए जाने वाले धर्मों को दो क़िस्मों में बांटा जा सकता है। सत्य व असत्य धर्म। सच्चा धर्म वह है जिसके सिद्धांत तार्किक और वास्तविकताओं से मेल खाते हों और जिन कार्यों का आदेश दिया गया है उसके लिए उचित व तार्किक प्रमाण मौजूद हों। अर्थात धर्म की जो परिभाषा यहां बताई गई उसके आधर पर हर वो प्रक्रिया जिसमें मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कुछ संस्कार करता है उसे धर्म कहा जाता है किंतु यह निश्चित नहीं है कि वो संस्कार सही हो क्योंकि धर्म के पालन का उद्देश्य इस सृष्टि के रचयिता को प्रसन्न करना होता है और यह नहीं हो सकता कि वो ईश्वर परस्पर विरोधी कामों से प्रसन्न हो। उदाहरणस्वरूप यह संभव नहीं है कि ईश्वर दूसरों को लूटने वाले से भी प्रसन्न हो और दूसरों की सहायता करने वाले से भी। झूठ से भी प्रसन्न हो और सत्य से भी। वो यह तो झूठ से प्रसन्न होगा या फिर सत्य से। इस लिए हम यह नहीं कह सकते कि इस संसार में जितने भी धर्म हैं सब ईश्वर तक पहुंचाते हैं और मनुष्य चाहे जिस धर्म का माने अंततः ईश्वर तक पहुंच ही जाएगा क्योंकि किसी भी गंतव्य तक पहुंचने के लिए कुछ निर्धारित मार्ग होते हैं इस लिए यदि कोई मनुष्य ईश्वर तक पहुंचना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि वो सही मार्ग की खोज करे। इस बात का पता लगाने का प्रयास करे कि कौन से संस्कार और कौन से कर्म ईश्वर को प्रसन्न करते हैं और कौन से कामों से वो अप्रसन्न होता है ?

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

डो.साहब आप ने जो सवाल उठाया वो सनातन सवाल है । किसी को अभीतक जवाब नही मिला । जवाब पाने की कोशिश में हजारों वाद खडे हो गये और नये सवाल खडे कर दिये । मैं एक सवाल खडा करता हुं, कोइ जवाब दे पायेगा । २० साल पहेले १९९२ में मै अपनी बाईक ले के अन्जाने में शेरों की बस्ति के पासवाली सडक से निकल गया था । सडक खतम होने के बाद पूलिस ने रोका तो गंभीरता का पता चला । तब मुझे लगा ठिक है चलो मैं बच गया । मन पर ज्यादा प्रभाव नही पडा । लेकिन कुछ साल बाद जब डिस्कवरी चेनल पर एक भैंसा और चार शेर की लडाई देखी, तब से मुझे नजरत हो गई है शेरों से । लोग मानते हैं जानवर अबोध है लेकिन ऐसा नही है, कितनी चालाकी से भैंसे को मारा अपनी आंखों से देखा । आप मुंबई के कुछ उपनगर या आसपास के गांववालों की की हालत देखिए । आये दिन तेंदुए बच्चों के उठा के जाते हैं । बडे आदमी को भी मार देते हैं । लेकिन सरकार को आदमी से ज्यादा जानवर की पडी है । उस का ये परियावरणवाद किस का फायदा करवायेगा । मैं आदमी के बीच जी रहा हुं ईस लिए आदमी के हीत के लिए स्वार्थी बन गया हुं और मान ने लगा हुं की आदमी को नुकसान पहुंचानेवाले हर प्राणी को मार देना चाहिए । अब डो.साहब, ईन प्राणियो की सक्षा के ठेकेदार मेरी ईस बात का विरोध करेंगे । आप भी धर्म संकटमें आ जाओगे । मतलब ये है की ये सारी बातों का कोइ स्टान्डर्ड जवाब नही होता । सब का अपना अपना नजरिया है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

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मान्यवर यह आन्दोलन केवल अन्ना जी एवं रामदेव जी का नहीं है। बल्कि आम जनता का है। आप आम जनता इस भ्रष्ट व्यवस्था के नेताओं की तरह मूर्ख एवं भोला समझते हैं। इन नेताओं ने ही हमें जाति एवं धर्म में बाँट रखा है। जनता के आन्दोलनों को साम्प्रदायिकता का  आरोप मढ़ देते हैं। क्या आप साम्प्रदायिक वैमनस्यता को फैलाना ही ऊर्जा का सदुपयोग समझते हैं? इन आन्दोंलनों का विरोध वही कर रहे हैं जो स्वयं भ्रष्ट हैं। संभवतः आप  तो ऐसे नहीं दिखते। लालू, मुलायम, माया आदि का विरोध करना तो जायज है लेकिन  आपका समझ के परे है। क्या आप भ्रष्टाचार को धार्मिक कृत्य समझते हैं? जब कोई भ्रष्टाचार का समर्थन करता है तो बहुत दुख होता है। क्या आपको नहीं होता? आप क्यों भ्रष्टाचार का समर्थन करके अपने आपको दुखी करते हो? मान्यवर आप धार्मिक आन्दोलनों को छोड़कर भ्रष्ट व्यवस्था  के विरुद्ध कोई आन्दोलन छेड़िये। देश आपका आभार व्यक्त करेगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

जमालभाई आप का कहना सही है वो अजन्मा ही है । उसे ढुंढने ले लिए कोशीश हो रही है । लेकिन आदमजात मानने को तैयार ही नही आदमी की सीमा सुक्ष्म और विराट के बीचमें ही है । ना वो सुक्ष्म के अंदर घुस सकता ना वो विराट के बाहर जा सकता । आजकल सुक्षमें घुसने की कोशीमें एक कण ढुढ निकाला और नाम दे दिया गॉड का कण । भगवान का एक छोटासा टुकडा । विज्ञान की ये अंधश्रध्धा है । अगर कोइ गोड है तो वो विराट में होना चाहिए सुक्षमें नही । उस अजन्मेने ब्रह्मांड बनाया है तो वो ब्रह्मांड के अंदर नही मिल सकता । अपने ही प्रोडक्टमें वो क्यों रहेगा । बाहर बैठा होगा । आदमी की हैसियत अपने सुर्यमंडल को पार करने की नही है । तो ब्रह्मांड की बातें करना बेकार है । वो किसी के हाथ नही आनेवाला । कल्पना में मिल ले वो अलग बात हैं । चलो मैं आप को उन से मिलाता हुं । मैं -- अजमलभाई ये जो लाईट दिखती है न वो कुदरत है । और कुदरत जी, ये अजमलभाई है । हम लोग आपकी प्रुथि से आये हैं आप को मिलने । कुदरत -- कौन सी प्रुथ्वि और तूम कौन से पदार्थ के कण हो । अजमलभाई -- हम आदमजात । आपके ही बनाये हुए बंदे । कुदरत --- मैंने ही बनाया और मुझे मालुम नही । बात साफ करो । मै --- सर जी, याद करिये, पहले मैं एक दफा आया था और आप को प्रुथ्वि दिखाया था । आपने कहा था ईस गोली पर नमी हो गई है, नमी के कारण सडन हो गई है, जीव जंतु पैदा हो गये हैं । आप तो उस नमी को पोंछना चाहते थे, उस सडन को साफ करना चाहते थे । मैने आप को रोक दिया था, जरा याद करिये । कुदरत --- हां हां तो तू वही जन्तु है । अच्छा, अच्छा आओ बच्चों । बताओ क्या कहना चाह्ते हो । अजमल्भाई --- सर जी, अब में वापस नही जाउंगा यहीं रहुंगा । बाकी लोग किधर है । कुदरत -- यहां तूम दो जंतू के अलावा और कोइ जंतू नही है । तूम लोग जल्दी चले जाओ, यहां नमी नही है जन्तू नष्ट हो जाते हैं । मै -- सर जी मेरी फरियाद है । आप सब जंतू का एक जैसा स्वभाव कर दो । आप के ही नाम से एक दूसरा जंतु लडता रहता है । मुझे तो आप का ही दोष दिखता है । कुदरत -- अरे, छोटे कीडे की टांग, मुझे सिखायेगा । देखो अपनी चारों और मेरी अरबों गोले और गोलियां दिखेगी । साफ सुथरी और चमकीली । मुझे कुछ फरक नही पडता की मेरी एक छोटी सी गोली की सपाटी सड जाती है । फरक पडता तो कब से साफ कर देता । और तूम सब जंतू मर गये होते । जूम जंतूओं के लिए मै जिम्मेदार नही हुं वो समज लो और भागो ईधर से । हम दोनों को भगा दिया । अब क्या ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

जमाल साहब ,अस्सलामवालेकुम ! वह मकसद भूल गया !वाह जमाल साहब,गोया इंसान को किसी ने किसी ख़ास मकसद के लिए भेजा है !जिस किसी ने भी भेजा है वो शायद स्वयम यह मकसद पूरा करने में असमर्थ है !तभी तो करोडो-करोड़ों इंसानों को भेज दिया की जाओ मकसत पूरा करो ! जनाब जमाल साहब, मैं जीवन के ५५ वसंत देख चुका हूँ ! आज तक मेरी समझ में नहीं आया मैं क्यों कर हूँ ? इस सवा अरब के मुल्क में मेरी क्या ज़रूरत थी ? आप कहते हैं मकसद ! फिर क्या मकसद है मेरा ? यदि मेरा मकसद किसी और के प्रति है तो उसका मकसद क्या है ? कहीं यह मकसद-मकसद तो नहीं खेला जा रहा ? फिर आप हासिल करने की बात करते हैं ,आखिर क्या हासिल करना है ? ईतिहास गवाह है जिसने जितना हासिल किया उसकी ख्वाहिशें उतनी ही बढती गई ! और अंत में सब ठाठ पड़ा ............! याद-रख सिकंदर के हौसले तो आली थे ! जब उठा जमीं से तो दोनों हाथ खाली थे !! फिर आप भटक जाते हैं ,मुसीबते / नशा /ब्याज / व्यभिचार की बातें कर अपने मन की भड़ास निकालते हैं !त्याग /जंगल /राजनीती की बातें करते-करते धर्म पर आ जाते हैं , जिसके बारे में आप कत्तई नहीं जानते !मात्र शब्द हैं आपके पास ,वो भी आपके अपने नहीं दूसरों के पढ़े-सुने ! आपका अपना कुछ भी नहीं ! सच है धर्म की व्याख्या केवल और केवल वही कर सकता है जो धर्म के बारे में बिलकुल नहीं जानता ! लोक-परलोक / तथा-कथित मकसद / स्वर्ग-ज़न्नत / जवान-क्वारी हूरें एक नहीं थोक में यह सारा खेल इंसानी फितरत का है फिर चाहे किसी काल में गडी गई हो !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

अनवर साहब, नमस्कार, इंसान का मकसद क्या है? सच को जानना, सच खुदा और धर्म नहीं है। सच तो विज्ञान है। ईश्वर और धर्म हमें  सच जानने से दूर करता है। हमें बँधनों में बाँध देता है। हमारे विचारों के चारों तरफ अपने बँधनों की बाढ़ लगा देता है। इंसान मकसद भूल गया है, पर कैसे? इसे भूलाने वाला तो ईश्वर ही है, फिर दोष इंसान का क्यों? सही और गलत रास्ते बनाने वाला ईश्वर ही है। भाई क्यों बनाये तूने गलत रास्ते? क्या हमें भटकाने के लिये? इसका दोषी भी ईश्वर ही हुआ। नशा कौन नहीं करता? बिना नशा के तो आदमी एक पल भी नहीं रह  सकता। किसी को भक्ति का नशा, किसी को धर्म का नशा, किसी को ब्लॉग लिखने का नशा, किसी को भ्रष्टाचार करने का नशा, किसी को धर्म की झूठी कहानियाँ द्वारा लोगों को बहकाने का नशा। ब्याज लेने को आप किस आधार पर अनुचित ठहराते हैं? मेरी समझ के परे है। क्या आप गीता के सिद्धांत की बात कर रहे हैं कि कर्म करों और  फल की इच्छा मत करो? क्या आप मनुष्य को इच्छाहीन बना देना चाहते हैं? वह ब्याज अनुचित हो सकता है जो किसी से अनुचित तरीके से मुलधन से कई गुना अधिक वसूला जाय। क्षमा करना आपकी बातें बौद्धिक नहीं हैं। पूर्णतः धार्मिक हैं, धार्मिक अर्थात् झूठीं। वानप्रस्थ आश्रम की आलोचना करने का आपका आधार क्या है? प्रथम  आप वानप्रस्थ का अर्थ समझिये। वानप्रस्थाश्रम का उद्देश्य है कि केवल अपने एवं अपने परिवार के बारे में न सोच कर सम्पूर्ण मानव जाति के बारे में सोचना। गैलैलियो, आर्कमिडीज, सुकरात, ईसामसीह, मुहम्मद साहब,  महात्मा गांधी, शिवजी, आदि इन सभी से वानप्रस्थ आश्रम ही तो धारण  किया था। और हमें धार्मिक आडम्बरों से मुक्ति दिलाई थी। जिन धार्मिक आडम्बरों की महिमा का आप बखान कर रहे हैं। यह मेरी व्यक्तिगत राय है, मैंने जो लिखा है सत्य एवं अपने द्वारा रचित परिभाषाओं के आधार पर लिखा है, मेरा मकसद किसी की भावना को आहत करना नहीं है, अपितु सत्य को परिभाषित करना है। ईश्वर और धर्म के संबंध में भरोदिया जी ने जो लिखा है, यही अंतिम सत्य है। इसके अलावा और कुछ नहीं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

डॉ साहब आदाब और नमस्कार आज जब दुनिया छोटी हो गई है तो सारी दुनिया में किधर क्या क्या पडा है सामने आ गया है । आज लगभग ४३ हजार धर्म और ईस की शाखाए सामने आ गई है । एक धर्म की ऍवरेज ४ शाखा मान लें तो १००० प्रमुख धर्म होते है । ईस के ईश्वर भी हजार हुए । समजदार आदमी सोचता है की अगर हमारा धर्म ही सच्चा है तो बाकी ९९९ धर्म का क्या । रहते तो है सब एक जमीन पर । कोइ आसमान से भी नही टपका । और कुदरत कोइ संसदभवन या कोइ बडा ऑफिस ले के नही बैठा है की हजार भगवानों को नौकरी पर रख ले । अगर हमारा भगवान सही है तो बाकी ९९९ भगवान भी सही होने चाहिए । लिकिन ईतने सारे भगवान हो नही सकते तो कोइ भी भगवान नही है । धर्म का छेद निकलने का कारण यही है । मैं अब जो लिखता हुं ईसे खुले दिमाग से समजीये । बात लंबी है माफ करना । . आदमी प्राणी की तरह रहता था । लेकिन उसमें बुध्धी थी तो बुध्धिबल से समाज रचना की, प्राणी की तरह रहना पसंद नही था । समाज को चलाने के लिये राज्य व्यवथा की जरूरत थी तो राजा आया । राजा थक गया था जाहिल प्रजा को हॅन्डल करते करते । राजा के कायदे जाहिल प्रजा मानती नही थी । राजा कितनों को शूली पे चढाए, कितनों को बंदी बनाये । कुछ प्रजा को तो राक्षस या शैतान समजकर उस की पूरी जाति का नाश कर दिया । थक हार के एक उपाय ढुंढ निकाला । प्रजा को ऐसी कोइ चीज से डराया जाए, और नियमों को भी ईस चीज के साथ जोडा जाये तो आदमी डरका मारा सिधा चलेगा और समाज शान्ति से जी पायेगा । उस चीज को भले आज हम ईश्वर या अल्ला नाम दे दें , पर मूलतः ये जुठ था । ईश्वर जुठा पर नियम सही थे, उस जमाने के अनूरुप । ईस जुठ और सच के मिक्षर से आदमी ईश्वर के डर और नियम से चलने लगा । जबरदस्ति की नैतिकता, पर आदमी नैतिक तो बना । धर्म और शासन एक दूसरे के पूरक बने । धर्म और शासन दोनों जुठे । जुठे लोगों द्वारा संचालित । फिर भी दोनों जरूरी । दो में से एक को हटा के देखो, लोग चड्डी खिंच लेंगे एक दुसरे की । जुठी चीजें भी समाज के लिए जरूरी हो, एक बलिहारी ही है । धर्म और शासन का विरोध उस की असर को कम करता है । सीधा समाज को ही हानि है । आज के विद्वान समज बैठे हैं की हमने सबकुछ जान लिया है । समाज में कैसे रहना है हमे पता है । धर्म के पास उधार की नैतिकता की हमें जरूरत नही है । हमारे पिछे पूलिस को भागना नही पडता है वो साबित करता है हम कितने सीधे हैं । ऐसे लोग धर्म का ही विरोध करते है, मजाक करते हैं । ईन लोगों को समज लेना चाहिए की आप जैसे लोग कितने प्रतिशत है समाज में । बहुत कम, ज्यादातर तो जाहिल ही है । उन्हें अभी भी १०० सालतक धर्म के डोज की जरूरत है । धर्म को असरकारक बनाने के लिये लिखित या मौखिक किताबें बनी । लिखी हुई बातें बालकथा जैसी । परीकथाए । जुठ और गप से भरपूर, बिना लगाम के कलपना के घोडे । आज के आदमी को पसंद ना आये ऐसी अनेक बातें । लेकिन हमें समज लेना चाहिए की वो सब आज जे आदमी के लिए नही था । उस समय की अनपढ और गंवार जनता यही समज सकती थी । और लिखने वाले विद्वान हम मान बैठे हैं ऐसे महान नही थे । वो सब नोन मेट्रिक थे । वो पूरखे थे तो उन के प्रति अहोभाव की कोइ जरूरत नही । आजका कोइ भी धार्मिक विद्वान उनसे बेहतर है । कहीं ज्यादा अच्छी धार्मिक किताब लिख सकता है, जो आज के आदमी के दिमाग में बैठे । अजमलभाई, आप जो बातें बता रहे हैं वो या तो मुस्लिम धर्म की वकालत है या कोइ नये धर्म की खोज है । भाई भारत में बहुत धर्म है कोइ नये धर्म का बोज उठा नही पायेगा । जो धर्म है अपनी जगह ठीक है । सब धर्मों को वहीं पर सुधारने की जरूरत है । वो काम मौलवी और गुरु ही कर सकते है धार्मिक पुस्तकों मे से विवादित चीजें निकाल कर । आप तीसरी कक्षा के ब्लोग में जा के देखोगे तो पता चलेगा कितनी गालियां दे रहे हैं जाहिल लोग एक दूसरे को । एक दुसरे के ईश को नंगा कर के । किसने किसको पैदा किया वो विषय गुरुओं और मौलवियों पर छोड दो, आप उन को समजाओ की अपनी अपनी किताबें सुधार लें । जाहिल जनता से वो ही निपटेंगे । आप खूद गुरु बन के ईस फोरम में जाहिल को ढुंढेंगे तो नही नही मिलेंगे ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

@ अनिल कुमार ‘अलीन’ जी ! पूरे विश्व में बहुत से अलग अलग देश हैं और सब में अलग अलग व्यवस्थाएं है. किसी व्यवस्था में कोई कमी है तो दूसरी व्यवस्था में दूसरी . किसी व्यवस्था में कोई खूबी है तो किसी में कोई. हरेक देश अपनी व्यवस्था की खूबी के बल पर चल रहा है और अपनी खराबियों के बल पर ठोकरें खा रहा है. जिस देश ने अपनी जो समस्या हल की है, सत्य के बल पर की है. किस समस्या को किस देश ने कैसे हल किया है ? उस हल को देख कर हम जन सकते हैं कि वह देश उस विशेष माले में सत्य पर है क्योंकि सत्य समस्याओं का समाधान देता है. इस तरह हम बहुत से मामलों में सत्य जान सकते हैं और अगर वैसी ही समस्या हमारे सामने हो तो हम उसे हल भी कर सकते हैं. यह सत्य को जानने की एक समाज शास्त्रीय विधि है.

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

अब आप तरीका की बात मत करिए...............मैं जो बिंदु उठाया हूँ क्या वह झूठ है..............? चलिए आप जिस बिंदु पर बात करेंगे मैं भी उसी बिंदु पर बात करूँगा.......आप जहाँ अंत करेंगे मैं वही शुरुवात करूँगा.......आखिर देखता हूँ आप कबतक एक सवाल पर से दुसरे सवाल पर भागते हैं........तो ठीक है अब जब आप तरीका की बात कर रहे हैं तो मैं तरीका ही शुरू करता हूँ............ तो अब तक जो तरीका पुरे विश्व द्वारा अपनाया गया ..उससे आज तक शांति और न्याय व्यवस्था स्थापित नहीं हो पाई तो आप मानते हैं कि सारे तरीके झूठ हैं.....मतलब कि धर्म, परंपरा, आस्था-विश्वास और आज की राजनीतिक, सामाजिक, न्यायिक व्यवस्था जिससे आज तक न्याय और शांति स्थापित नहीं हो पाई...............क्या यह सब झूठ है..?

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आपके कहने का मतलब यह है कि जिससे मनुष्य कि व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याएं हल न हो वह सब झूठ है......................तो......इसका मतलब कि निम्न बातें झूठ हैं क्योंकि इसने व्यक्तिगत और सामूहिक समस्यायों को जन्म दिया है या फिर फिर बढाया है........... > जैसे कि ईश्वर में आस्था.....जिसे लेकर सबका एक अपना मत हैं और सब एक दुसरे से लड़ते रहते हैं.....क्या यह सब झूठ हैं? > जैसे कि आये दिन लोग धर्म, जाती, क्षेत्र के नाम पर एक-दुसरे का खून बहा रहे हैं ..क्या वो वो सब झूठ है ? > बीच सड़क पर कोई दर्द और पीड़ा से मरे जा रहा है पर कोई भी उसके मदद के लिए आगे नहीं बढ़ता ....क्या यह सब झूठ..... > मान-सम्मान के नाम पर मानवीय मूल्यों को रौंदा जा रहा हैं .....क्या यह सब झूठ हैं....? > हरेक आदमी फुड को अच्छा ( राम)और दुसरे को बुरा(रावण) बता रहा है ..क्या यह सब झूठ हैं......? > लडके के नाम पर कन्या भ्रूण कि हत्या कि जा रही हैं ......क्या यह झूठ हैं......? > आज स्वार्थ और वर्चस्व की लड़ाई में देश के हालात नाजुक हो गए हैं .....क्या यह सब झूठ हैं..? और आज भी ऐसी बहुत सी घटनाएँ जो हमारे आस-पास होती रहती हैं.....क्या यह सब झूठ है? _____________________________________________________________________ जहाँ तक मेरी सोच कहती हैं........... यदि भौतिक रूप से बात किया जाय तो...........जो दिख रहा है या महशुस किया जा रहा है वही सत्य हैं.... यदि आध्यात्मिक रूप से बात किया जाय तो....जो आदि है और अनंत भी, जो समय और सीमा से परे हैं, जो कभी ख़त्म नहीं होने वाला ..वही सत्य है.......... यदि जीवन की बात किया जाय तो आपका और मेरा मरना ही सत्य है.......और सत्य किसी विशेष ग्रन्थ, इतिहास, सामुदाय और सभ्यता की मोहताज नहीं...........सत्य की कोई सीमा नहीं................सत्य न ही कहीं कम हो सकता हैं और न ही कहीं कम........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय जमाल जी, सादर ! "" समाज के सबसे ज़्यादा बुरे फ़ैसले सबसे ज़्यादा शिक्षित लोग करते हैं। "" यह बहुत कठोर बात है परन्तु चरम सत्य है ! नेतृत्व हमेशा बुद्धिमान ही करता है ! समाज की दिशा भी वही तय करता है ! पूर्व काल में समाज की दिशा तय करने के लिए ही धर्म ग्रंथों या दुसरे शब्दों में दिशा-निर्देश ग्रंथों की अवधारणा की गई होगी ! धर्म का अर्थ ही है धारण करने योग्य ! अनुभव की एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरने के बाद इनमें एक-एक वाक्यों को संयुक्त किया गया होगा, जिनमें बहुत सी बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक और उपयोगी हैं जितनी उस समय थी ! पर अगर नेतृत्व करने वाला बुद्धिमान न होकर धूर्त हो, (क्योंकि बुद्धिमान ही धूर्त होगा) तो फिर उस समाज को भटकते देर नहीं लगती ! दुर्भाग्य से इस समय के अधिकाँश नेतृत्व करने वाले बुद्धिमान धूर्त हैं, जिनके जाल में फंसकर समाज दिशाहीन होता जा रहा है ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

@ dineshaastik ! भाई साहब ! हम ने तो किसी धर्म ग्रन्थ में कोई कमी नहीं निकाली। हमने तो यही कहा है कि हरेक धर्म पुस्तक में हीरे मोती जैसी बल्कि उनसे भी ज़्यादा क़ीमती बातें हैं। इसके बावजूद भी आपको यह क्यों लगा कि हम किसी धर्म में कोई कमी निकाल रहे हैं ? आपको वेदों में विज्ञान नज़र आता है तो हमें इस पर कोई ऐतराज़ नहीं है। हमें भी वेदों में विज्ञान मिलता है बल्कि हमें विज्ञान के साथ साथ सामाजिक विज्ञान और इतिहास भी नज़र आता है। हमारे पास चारों वेद मौजूद हैं। वेद मेरी पसंदीदा किताबों में से हैं। इनके ज़रिये हम अपने अतीत से जुड़ जाते हैं। आपके सवाल क्या हैं ?, जिनके जवाब आप हमसे पाना चाहते हैं। आप अपने सभी सवाल कम शब्दों में एक जगह लिखकर हमारी किसी पोस्ट पर डाल दीजिए या फिर हमें ईमेल कर दीजिए। अगर उनका जवाब हमें पता हुआ तो हम आपको जवाब ज़रूर देंगे।

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

अनवर साहब, अफसोस होता है कि आप अपनी बुराई नहीं दूसरों की बुराई  देखते हैं। बीमारी आपको है और आप इलाज दूसरे का करते हैं। यदि आपको सत्य की खोज करना है तो वेद को पढ़िये। मेरी दृष्टि में वह धार्मिक नहीं, अपितु एक वैज्ञानिक पुस्तक है। सर्वप्रथम तो आप अपने धार्मिक चश्मे को उतरिये और मानवता का चश्मा लगाइये। वेदों के अतिरिक्त जितने भी धर्म (अधर्म) ग्रन्थ हैं, सभी डर, अज्ञान, एवं स्वार्थ के कारण लिखे गये हैं तथा जिन्हें असत्य की स्याही से लिखा गया है। आप यदि दुनियाँ में बदलाव लाना चाहते हैं तो पहिले अपने आपको बदलिये, पहिले अपनी बराईयों को ढ़ूढ़िये। मुझमें भी बुराईयाँ हैं। लेकिन मैं अपनी  बुराईयों को छुपाने के लिये दूसरों की बुराईयों को नहीं खोजता। आपके कई ब्लॉगों में मैंने आपसे कई प्रश्न पूछे हैं, लेकिन आपने एक भी प्रश्न का  सटीक उत्तर नहीं दिया। क्या कारण जान सकता हूँ।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

अनवर साहब मैं अपने मूल प्रश्न के उत्तर से अभी भी वंचित हूँ जो मैंने ईश्वर एवं धर्म के संबंध मैं किये थे। संभवतः आप नास्तिक है अतः इस संबंध में आपको अधिक ज्ञान प्राप्त होगा। क्योंकि मैं भी प्राप्त करना  चाहता हूँ उस ईश्वर को जो वास्तव में नहीं है। शायद आपके द्वारा प्राप्त कर लूँ उस ईश्वर को जो नहीं है। एक झूठ को हजार बार या लाख बार बोला जाय तो क्या वह सत्य बन जायगा। शायद नहीं। कोई मुझे एक  प्रमाण तो दे दे उसके होने का। मेरा मानना है कि यदि ईश्वर है तो वह न तो दयालु हो सकता है न ही सर्वशक्तिमान और न ही न्यायकारी। वह सर्वज्ञाता एवं सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता है।  ईश्वर की तुलनी माँ बाप से करना क्या उसके अस्तित्व नकारना या उसके प्रभाव को कम करना नहीं है। ईश्वर की तो किसी से तुलना हो ही नहीं सकती। यह बात तो सभी झूठे धर्म ग्रन्थों में लिखी है। हमें जो बुद्धि दी है वह उसी की दी हुई है। फिर उसने हमें वह बुद्धि क्यों नहीं दी कि हम उसीके हिसाब से चले। उसकी हर आज्ञा का पालन करें। यदि उसने ऐसा नहीं किया है तो यह उसकी अल्पज्ञता है, उसका अक्ष्मय गुनाह है। उसकी दुर्बलता है।  उसने निषेध विधि का निर्माण किसके लिये किया। ओह हर चार मिनिट में एक भारतीय मरता है, फिर तो वह हत्यारा हुआ। जो उसे मानते हैं क्या वे नहीं मरते?

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

डा.अनवर ज़माल खान साहब ! (माशअल्लाह) अस्सलामवालेकुम ! अनवर साहब क़िबला ये बताएं की आप किस तरह के डा. हैं ? मुआफी चाहूँगा ,दरअसल वाकया यह है की हमारे अजीजों में एक साहब इलेक्ट्रीशियन हैं हम प्यार से उसे बिजली का डाक्टर कहते हैं !इत्तेफाकन याद आया की कहीं आप भी सांप्रदायिक डाक्टर तो नहीं ? क्यों की ऐसी फितरत तो सिर्फ मुल्ला/पंडित/फादर/ जैसी शक्सियतों में पाई जाती थी लेकिन आधुनिक समय में इस सन्दर्भ में भी डाक्टरेट होने लगी है सो गुस्ताखिमाफ ,यह सिर्फ जानकारी के लिए पूछा ? धर्म की व्याख्या सिर्फ और सिर्फ वही लोग करते हैं जो धर्म के बारे में कत्तई नहीं जानते ! है न अजीब बात ? लेकिन सौ फीसदी सही है ! हिन्दू/इस्लाम/ईसाइयत....हजारों धर्म/संप्रदाय है जो इन्सान द्वारा इन्सान के लिए बनाये गए !खुदा/ईसा/ईश्वर ...ने ऐसा कोई धर्म धरती पर नहीं भेजा ! भेजा तो केवल इन्सान ! और फिर इन्सान ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए धर्म के नामों का सहारा लिया ! जब लाभ दिखा तो लाखों ठेकेदार पैदा हो गए बहती गंगा में हाथ धोने गोया हारुन का खजाना हाथ लग गया हो ! मियां जामल ,एक बात गाँठ बाँध लें की सिर्फ अधर्मी व्यक्ति ही धार्मिक हो सकता है ! क्यों की उसका कोई एक धर्म नहीं है उसके लिए सारे मार्ग एक ही मंजिल को जाते हैं ! वह है इंसानियत सिर्फ और सिर्फ इंसानियत ....! खुदा आपको और आप जैसों को नेक-नियति दे ! खुदा-हाफिज़ .....!

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

डॉक्टर साहब आपने कहा कि ईश्वर ने हमें आज्ञा दी है कि मेरी आज्ञा मानो। फिर तो ईश्वर कोई तानाशाह राजा रहा होगा। केवल  उसके कहने से कि वह ही ईश्वर है, हम  मान  लें यह तो हमारी अज्ञानता का घोतक  है। कहीं यह  किसी बुद्धिमान  व्यक्ति की शरारत  तो नहीं है। जैसा कि आज  कल  स्वभू धर्म  गुरु अपने शिष्यों के माध्यम  से अपने आपको ईश्वर घोषित  कर देते  हैं। आज  संचार  के माध्यम  हैं, अतः उनके दावे खोखले हो जाते हैं। फिर भी उनके शिष्य उन्हें ईश्वर  के रूप में ही देखते हैं। ईश्वर  की इस  तरह  की आज्ञा हमें मानसिक  एवं वैचारिक  रूप से गुलाम  बनाती है। निराकार ईश्वर में कैसे कहा समझ  ही नहीं आता। कहने के लिये वाणी की जरूरत  होती है, जो ईश्वर के पास नहीं होती।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

डाँक्टर साहब मैं नहीं समझ  पा रहा कि आप  पैदा करने वाला किसे कह रहे हैं। क्या माता पिता के अतिरिक्त भी कोई है। यदि है तो उसे हमने ही पैदा कि है। आप  इस  बात  को तर्क  की कसौटी पर कसने का प्रयास  कीजिये। धर्म  का नशा हमें सत्य  से दूर  करता है। आप  जिसे सत्य  कहते हैं वह हमारा भ्रम  है। आप  ईश्वर की वाणी की  बात  करते हैं, लेकिन  जो निराकार है वह कैसे अपनी वाणी की  अभिव्यक्ति करेगा। हम  अपनी आवज  को उसकी आवज  बना  देते हैं। आइये अनवर जी हम  खुदा की नहीं इंसानों की बात  करें। खुदा तो हमें आपस  में लड़वाता है। मंदिर मस्जिद  गिरवाता है। हम  इंसान की पीड़ा तो सुन  नहीं पाते आप ईश्वर की आवाज  की बात करते हैं और उस  ईश्वर की जो अनुपलब्ध  है। जो अशुभ का भी सृजन करने वाला भी है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ आप धर्म  को समझ  रहे क्या, समझ  न पाया? मैंने मदिरा का इस  पर इल्जाम  लगाया। मैंने पूछे प्रश्न आपसे जाने कितने, मगर आपसे एक  नहीं है उत्तर पाया। हिन्दु क्या है? मुझसे अधिक  आपको मालुम, मुझसे प्रश्न आपने यह तो व्यर्थ  उठाया। मैंने माना खुदा कल्पना है मानव की, उत्तर इसका नहीं आपने मुझे बताया। बिन  आनन(मुख) के उसकी वाणी कैसे निकली, क्योंकि अ ब तक  मुझे किसी ने न  समझाया। हिन्दु कोई धर्म  नहीं है, संस्कृति है, जो भारत  का है उसमें हिन्दुत्व समाया। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ डॉक्टर साहब यदि आपकी अनुमति हो तो जो मेरे मन में ईश्वर के संबंध  में अनगिनत  सवाल  उपद्रव  कर रहे हैं, प्रस्तुत  करूँ। इस   आशा से कि आपके पास  निश्चित  ही उत्तर होंगे।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

धर्म हमेशा से सारे समाज के लिए रहा है . @ rajuahuja ji ! हमने कहा है कि “इस्लाम का नाम लेना ही काफी नहीं है बल्कि उसके मुताबिक़ अमल करना भी ज़रूरी है. समाज में शांति तभी आएगी.” इस बात कि आप मुखालिफत कर रहे हैं और फिर उसी बात को अपने कमेन्ट में कहते हैं कि कुछ अमल भी ज़रूरी इबादत के लिए , सिर्फ सजदा करने से ज़न्नत नहीं मिलती ! हमारी बात आप को थोपना लग रही है और अपनी बात नियम. यह क्या मज़ाक़ है ? धर्म हमेशा से सारे समाज के लिए रहा है . यह कभी व्यक्तिगत नहीं रहा . हाँ इतना ज़रूर है कि जो धर्म को न मानना चाहे वह अधर्मी बनकर जी सकता है. कल्याणकारी चीज़ सदैव सबके लिए होती है हैसे कि सूरज, हवा और पानी कभी व्यक्तिगत नहीं होते.

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

ज़नाब ज़माल साहब ! सर्वप्रथम तो यह जान लें की धर्म इंसान का नितांत व्यक्तिगत मामला है !धर्म थोपा नहीं जा सकता !जैसा की आप जैसों की मानसिकता से ज़ाहिर होता है !आप जैसे तमाम साम्प्रदायों के तथाकथित ठेकेदार जो धर्म का भार अपने कन्धों पर उठाये फिर रहे हैं !न मालुम किस मुगालते में हैं ? ज़नाब जमाल मियां ,धर्म तो सिर्फ एक है..... "इंसानियत "! दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही वास्तव में धर्म है ! परस्पर प्रेम ही धर्म है !इन्सान का इन्सान की बेहतरी के लिए पैदा हर ज़ज्बा धर्म है ! धर्म का कोई नाम नहीं होता आज के प्रचलित धर्म तो आप जैसे ठेकेदारों द्वारा "संचालित" होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे ! किसी शायर ने कहा है कुछ अमल भी ज़रूरी इबादत के लिए , सिर्फ सजदा करने से ज़न्नत नहीं मिलती !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

डाक्टर साहब धर्म  तो परिवर्तित  हो ही नहीं सकता,  यदि वह परिवर्तिति होता है तो न तो परिवर्तन के पूर्व का और  न ही परिवर्तन के वाद का धर्म  हो ही नहीं सकता। धर्म  हमारे जन्म से जुड़ा होता है। उसने हमें जन्म  से इंसान बनाया है।यदि हम  खुदा के दिये हुये धर्म  को बदलते हैं तो  यह खुदा का अपमान  होगा। क्या हम  खुदा के विरुद्ध जाने की गुस्ताखी कर सकते हैं। यदि सब कुछ   उसकी मर्जी से होता है तो हमें जन्म से  हिन्दु और मुसलमान  उसीने बनाया। यदि हम  उसके विपरीत जाते हैं तो क्या यह उसका अपमान नहीं होगा। मुझे समझ  में नहीं आता कि हम  इंसान न बनके हिन्दु या मुसलमान बनने की क्यों सोचते हैं?

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

डॉक्टर साहब, मैं  यह भी नहीं मानता कि मैं जो सोचता हूँ, कहता हूँ या लिखता हूँ, वही सत्य है। हाँ सत्य की खोज  मैं आप जैसे विद्वानों की पोस्टों पर भटकता हूँ। महात्मा बुद्ध ने ऐक  बार अपने शिष्यों से कहा था कि तुम  किसी बात के इसलिये स्वीकार नहीं कर लेना कि वह गौतम  बुद्ध ने कही है, बल्कि उसपर ममन  चिन्तन करना, यदि आपका विवेक  एवं तर्क  बुद्धि उसे स्वीकार कर तो मानना अन्यथा नहीं। आज  मैं जो बातें कह रहा कि वह  आज  की परिस्थिति के हिसाब से उचित  और  उपयोगी हो सकती है, किन्तु भविष्य में वह अनुपयोगी और  हानिकारक  हो सकती है, अतः यदि मेरे बाद तुम्हें लगे कि सिद्धांत  अब उनुपयोगी एवं समाज  एवं देश  के लिये अव्यवहारिक  है तो उसे त्याग  देना। मुझे धर्म  का वैसा ज्ञान नहीं है जैसा एक  नास्तिक  को होता है चुँकि मैं आस्तिक  हूँ, मैं उसे सम्प्रदाय  समझता हूँ जिसे दुनियाँ धर्म  कहती है। एक  मात्र अपरिवर्तनशील  धर्म तो मानता है।  मानवता धर्म  के अतिरिक्त  किसी अन्य सम्प्रदाय  में विश्वास  करने वालों को मैं नास्तिक एवं काफिर समझता हूं। अपने देश  के कानून  और  नियमों का पालन करना ही धर्म  का पालन करना है। आपका मेरी प्रतिक्रिया को गम्भीरता से लेने के लिये हृदय से आभार......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

डॉक्टर साहब मैं नहीं समझ  पा रहा हूँ कि आप  किस  ईश्वर की वाणी बात  कर हैं, क्या उस  ईश्वर की जो वास्तव में है ही नहीं? क्या उस  ईश्वर की जो निराकार है जिसके मुख  आदि  कुछ  नहीं है? क्या उस  ईश्वर की जो सर्वशक्तिमान  होने के बाद भी संसार में अशुभ  एवं शैतान का निर्माण  करता है? क्या उस  ऩ्यायकारी की जो किसी के कितना भी बड़ा पाप करने पर उसकी शरण  में आने पर माफी मिल  जाती है? क्या उस  दयावान की जो केवल  अपने अनुयायी को ही स्वर्ग  प्रदान करता है? क्या  यह वही ईश्वर है जो कहता है कि मेरे मंदिर मस्जिद  का निर्माण  कर उनकी पूजा करो?  अब आप ही बताइये उसके निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयावान  आदि के गुण  कहाँ गये? क्या उसके यह गुण  विलुप्त नहीं हो जाते? क्या मंदिर मस्जिद की पूजा प्रतीक  पूजा ही नहीं कहलायगी? आप  भांग की बात करते हो, मैं तो धर्मों का शराब की तरह या उससे भी अधिक  जहरीला समझता हूँ। जिसके नशे में उन्मत्त होकर मनुष्य नर संहार करने को भी जायज  ठहराता है। सारे धर्म  स्थल  शराब खाने हैं दोस्त। मेरा धर्म  तो मानवता है मैं इसके अतिरिक्त  किसी भी धर्म  को स्वीकार नहीं करूँगा। मेरा मानना है कि जैसा कि हमें वयस्क होने का  बाद की तरह के अधिकार  मिल जाते हैं, वैसा ही हमें 18 वर्ष  के बाद ही अपना सम्प्रदायों  चयन  करने का अधिकार होना चाहिये इसके पहिले हमें सभी  सम्प्रदायों की शिक्षा दीक्षा दी जानी चाहिये।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

खुदा ने मुझे इंसान  बनाया था, तुमने मुझे हिन्दु मुसलमान बनाके नंगा कर  दिया। जिसने दुनियाँ बनाई, तुमने उसके लिये मंदिर मस्जिद बनाके दंगा कर  दिया।। ये धर्म  जहरीली शराब है इसे यहाँ मत  फैलाओ, खुद भी नहीं पिओ   और न मुझे पिलाओ। धर्म  का इतिहास  उठा लो, खून से सना है, इसलिये धर्म  का मेरे नजदीक  आना मना है। मेरा मानना है कि मानवता के अतिरिक्त कोई दूसरा धर्म  नहीं है। हिन्दु, मुसलिम ,  सिक्ख, तथा ईसाई आदि धर्म  नहीं अपितु सम्प्रदाय  हैं और प्रकृति के अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है।  यदि हम देशभक्ति को अपना धर्म  और संविधान  को अपना धार्मिक  पुस्तक  मान लें तो सारी समस्यायें नष्ट हों जायेंगी। लेकिन नहीं धर्म  की शराब के नशे की आदत हो गई है हमें। ये धर्म  हमारे देश  के टुकड़े टुकड़े करके ही दम  लेगा। मैं इंतजार कर रहा हूँ किसी खुदा के पैगम्बर का जो इस  धर्म  के टुकड़े टुकड़े करके हमें इससे निजात  दिलायगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

नंगेपन और ख़ुदकुशी का इलाज है इस्लामी सोच.! वाह..!!! तो क्या आपको लगता है कि ईसाई यहूदी बौद्ध हिन्दू धर्म इस तरह लड़के अथवा लड़कियों को बलात्कार अथवा आत्महत्या की छूट देते हैं.? फिर इस्लामी सोच से क्या मतलब? वही सोच जो लड़कियों औरतों को बुर्के में किसी बोरे की तरह लपेट देती है.? जनाब नंगेपन का इलाज नैतिक भावना है बुरका नहीं..!!! बंगाल दिल्ली बिहार में वेश्याओं में सबसे ज्यादा मुसलमान ही होती हैं पहले उन बुरके बालियों को नंगेपन से बाहर निकालो फिर दुनिया की ठेकेदारी करना.!! दकियानूसी सोच से बाहर निकलो.., जाकिर नाइक जैसे चन्द कठमुल्लों के पदचिन्हों पर मत चलो.., वरना जन्नत या ७२ हूर जैसा कुछ ढकोसला तो मिलेगा नहीं ये जिंदगी भी जहन्नुम बन जाएगी..!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

न मैं हिन्दु हूँ, न  मुसलमान  हूँ। केवल  और केवल  इंसान  हूँ। आज  तक  देखा न जो है, उसको कैसे मान लूँ। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जिसने यह दुनियाँ बनाई, उसके घऱ हम सब बनाते? जो बड़ा संसार से है, छोटे से घर में बसाते? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जिन्होंने ईसा को सूली पर चढाया था। खुदा उनको तूने ही बनाया था। फिर उनका दोष  कैसे हुआ? मेरी समझ  में नहीं आया था। बहुत  सुन्दर संसार  दिया तूने मुझे, लेकिन शैतान को धरती पर क्यों लाया था। सत्य की खोज  में निकला था वह पागल, बुद्ध  को जहर क्या तूने ही पिलाया था। राम  सीता कितने खुश  थे अयौध्या में, सीता को वनवास क्या तूने ही दिलाया था। तेरे साथ  में है सब कुछ , लोग कहते हैं, फिर गोधऱा काण्ड तूंने क्यों कराया था? क्या कसूर था भोपाल के बेकसूर लोगों का, जो तूने जान  लेवा गैस  को रिसाया था? तूं नहीं है इसलिये मेरी बातों का जबाब नहीं देगा, 2हजार वर्ष  तक  क्यों विदेशियों का गुलाम  बनाया था? तुमसे सवाल  पूँछने से क्या लाभ  है भगवन, मैंने अभी तक  एक  भी सवाल  का जवाब नहीं पाया था?

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हम ईश्वर के विषय में कुछ नहीं जानते और न ही जान सकते हैं। अतः यह निश्चुत पूर्वक नहीं कह सकते कि ईश्वर की सत्ता है या नहीं। प्रमाणों और तर्कों के आधार पर उसके अस्तित्व को प्रमाणित या अप्रमाणित नहीं किया जा सकता।अशुभ की समस्या के आधार पर उस ईश्वर को पूर्णतः अस्वीकार किया जा सकता है, जिसकी कल्पना ईश्वरवादियों ने की है।अपने समस्त गुणों को ईश्वर में प्रत्यारोपित करके मनुष्य स्वयं ही ईश्वर के प्रत्यय की रचना करता है, अतः ईश्वर वास्तव में मनुष्य की मानसिक कल्पना है। मानवीय ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टकोण की तीन अवस्थायें हैं-१.ईश्वर परक- यह प्रथम तथा निम्न अवस्था है। जिसे मानव का शैशवकाल कह सकते हैं। इस अवस्था में मनुष्य इन्द्रियातीत सत्ताओं तथा शक्तियों में पूर्णतः विश्वास करता है। बालक की तरह प्रत्येक प्राकृतिक घटना का अनुभवातीत देवीय पुरुष में ही ढ़ूढ़ता है। अनुभवातीत देवीय शक्तियों एवं उनमे विश्वास करने वाले गुरुओं का अधिक महत्व होता है। व्यक्ति और समाज दोनों को इस अवस्था से गुजरना पड़ता है। २.तात्विक- देवीय शक्तियों का महत्तव समाप्त कर उनके स्थान पर मनुष्य नैर्वेयक्तिक अमूर्त शक्ति को ही प्रत्येक प्राकृतिक घटना का हेतु मानता है। ३.प्रत्यक्षवादी- यह ज्ञान के विकास की सर्वोच्च अवस्था है। मनुष्य दैवीय तथा अमूर्त शक्तियों का परित्याग करता है। अपने अनुभव तथा प्रेरक्ष को ही ज्ञान का आधार बनाता है तथा सर्वव्यापी प्राकृतिक को खोजता है। प्रत्येक समस्या पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करता है। विज्ञान को महत्ता प्राप्त होती है। ईश्वर पर निर्भर होकर मनुष्य अपनी शक्ति को भूल बैठता है। ईश्वर के हनन से ही मानवीय महत्व को समझने का प्रयास हो सकता है। इसे भी अस्वीकारा नहीं जा सकता कि ईश्वर के निषेध से धार्मिक मूल्यों एवं आदर्शों के विलुप्त होने की पूर्णतः आशंका है। अधुनिक युग के आरंभ के लिये इसका महत्व गौण जाता है। बुद्धि से स्वार्थ भावना के साथ साथ मृत्यु और असफलता की आशंका भी जन्म लेती है। अपने अहम् भाव के सृजित होने के कारण, विनाश के संभावना की चिंता तथा कर्मों की असफलता की संभावना से उदिग्न होने के कारण बुद्धि प्रतिकार करके, नैतिकता की संभावना बनाती है। उसके उपाय स्वरूप कपोल कल्पनाओं द्वारा धर्म का उदय होता है। पहली कपोल कल्पना से अलौकिक तथा देवीय अस्तित्व कायम कर, उसकी स्वार्थ परता पर दण्ड की संभावना से नियंत्रित करता है। समाज विरोधी कर्मों पर अंकुश लगाने से समाज व्यवस्थित होता है। दुसरी कपोल कल्पना से आत्मा की अमरता के कारण, मृत्यु की आशंका से मुक्त होता है। तीसरी कपोल कल्पना से, सर्वशक्तिमान दयालु ईश्वर एवं उसकी आराधना के विधान से कठिनाई के समय सहायता द्वारा असफलता की आशंका से मुक्ति होती है।

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जो लोग ईश्वर की उपासना या उसकी इबादत करते हैं लेकिन अपने माँ बाप की सेवा नहीं करते उन्हें अपने माँ बाप की सेवा करने का यह आदेश स्वयं ईश्वर ने ही दिया है . ईश्वर ने यह आदेश कुरआन में भी दिया है और कुरआन से पहले भी अपनी वाणी में दिया है. ईश्वर की वाणी का वुजूद यह सिद्ध करता है कि ईश्वर मौजूद है. ईश्वर है तो पवित्रता है . ईश्वर को नकारने का मतलब है रिश्तों की पवित्रता को नकारना. जीव विज्ञान रिश्तों कि पवित्रता का उपदेश नहीं देता. क्या आप अपनी माँ , अपनी बहन और अपनी बेटी के साथ पवित्र रिश्ता नहीं रखते ? अपनी माँ , अपनी बहन और अपनी बेटी के साथ अगर आप पवित्र रिश्ता रखते हैं तो आप ईश्वर कि आज्ञा मान रहे हैं . इसका मतलब यही है कि आप ने ज़बान से तो ईश्वर के वुजूद को नकार दिया लेकिन अपने जीवन से और अपने कर्म से उसके मौजूद होने की गवाही देते रहे . है न ताज्जुब की बात ?

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आदरणीय  डॉक्टर साहब, सादर नमस्कार, विनम्रता से कहना चाहूँगा कि यदि वास्तव में ईश्वर है तो वह माता पिता ही हैं। इनके अतिरिक्त और कोई नहीं। जिस  ईश्वर की विभिन्न धर्मों (सम्प्रदायों या मतों) में की गई है, वह है ही नहीं। उसका जन्म हमारे डर और अज्ञान  के स्वार्थ  रूपी संसर्ग  से हुआ   है। असफलता एवं मृत्यु की आशंका से मुक्ति पाने के लिये हमारी स्वार्थ  बुद्धि ने उसकी  कपोल  कल्पना की है। उसकी अनुपलब्धता एवं संसार में अशुभ  का होना साबित  करता है कि वह नहीं है।  यदि वह है तो उसने इतने धर्म  और सम्प्रदाय क्यों बनाये। ऐसे अनगिनत  सवाल  हैं जिसका उसके पास  (जो है ही नहीं) कोई भी उत्तर नहीं है। मैंने ऐसे भी लोग  देखें है जो मंदिर और मस्जिद तो बनाने के लिये तैयार हो जायेंगे, किन्तु  अपने माता पिता को बुढ़ाने में बोझ  समझते हैं। नवाज  और पूजा तो समय  पर करेंगे, किन्तु माता पिता के क्या हाल  हैं, उन्होंने समय पर दवाई ली है या नहीं, उन्होंने खाना खाया है या नहीं, इसकी उन्हें फिकर नहीं। माता पिता के प्रति आपके भावों को सलाम...................

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